
उम्र का बंधन खत्म: अब नियमित छात्रों के साथ कैंपस में पढ़ाई कर सकेंगे हर उम्र के लोग
दिल्ली विश्वविद्यालय ने उन लोगों के लिए शिक्षा के नए दरवाजे खोल दिए हैं जो अपनी उम्र या अन्य कारणों से उच्च शिक्षा से दूर रह गए थे। विश्वविद्यालय की इस पहल के तहत अब किसी भी उम्र का व्यक्ति अपनी पसंद के विषयों की पढ़ाई कर सकता है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य समाज के उन वर्गों को फिर से पढ़ाई से जोड़ना है जो काम की व्यस्तता या किसी अन्य मजबूरी के चलते अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए थे। इस व्यवस्था के अंतर्गत युवाओं से लेकर बुजुर्गों और नौकरीपेशा लोगों तक सभी को बिना किसी पूर्ण डिग्री में प्रवेश लिए अपनी इच्छा के अनुसार पढ़ाई करने का अवसर दिया जा रहा है।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें दाखिला लेने वाले शिक्षार्थियों को अलग से किसी विशेष कक्षा में नहीं बैठना पड़ेगा। वे नियमित छात्रों के साथ ही एक ही कक्षा में बैठकर पढ़ाई करेंगे। इससे उन्हें विश्वविद्यालय का वास्तविक माहौल मिलेगा और सीखने का अनुभव भी बेहतर होगा। इसके लिए मूल्यांकन और परीक्षा की प्रक्रिया भी नियमित विद्यार्थियों के समान ही रहेगी। यदि कोई कार्यरत व्यक्ति इस अवसर का लाभ उठाना चाहता है तो उसे अपने संस्थान या नियोक्ता से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।
विश्वविद्यालय ने आवेदन प्रक्रिया को अत्यंत सरल और पारदर्शी बनाया है। इसके लिए एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल भी तैयार किया गया है जहां जाकर इच्छुक लोग उपलब्ध विषयों और उनके लिए जरूरी शैक्षणिक शर्तों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस योजना के तहत पंजीकरण की सुविधा पूरे साल खुली रहती है लेकिन कक्षाओं की शुरुआत संबंधित शैक्षणिक सत्र और सेमेस्टर के कैलेंडर के अनुसार ही होगी सीटों की संख्या सीमित रखी गई है इसलिए आवेदकों को सलाह दी जाती है कि वे सीटों की उपलब्धता देखकर समय पर आवेदन कर दें।
चयन प्रक्रिया पूरी तरह से योग्यता और निर्धारित मापदंडों पर आधारित होगी हालांकि उम्र की कोई ऊपरी सीमा तय नहीं की गई है लेकिन संबंधित विषय की पढ़ाई के लिए जरूरी शैक्षणिक योग्यता होना अनिवार्य है। आवेदकों का चयन अंकों की श्रेष्ठता के आधार पर किया जाएगा प्रत्येक सेमेस्टर में शिक्षार्थी अधिकतम दो विषयों का चुनाव कर सकते हैं। प्रति विषय का शुल्क तय कर दिया गया है जिसके अंतर्गत विद्यार्थी को कक्षा में उपस्थित होकर पढ़ाई पूरी करनी होगी और अंत में निर्धारित मूल्यांकन प्रक्रिया से गुजरना होगा। यह कदम शिक्षा को समावेशी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक प्रयास माना जा रहा है।
हेमलता शर्मा जयपुर
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