रील के भ्रम ने उजाड़ दिया ममता का संसार : एक भयावह डिजिटल त्रासदी

रील के भ्रम ने उजाड़ दिया ममता का संसार : एक भयावह डिजिटल त्रासदी

भीलवाड़ा। भीलवाड़ा के मांडलगढ़ से सामने आई यह घटना केवल एक अपराध की खबर नहीं, बल्कि आधुनिक युग के डिजिटल भटकाव की एक ऐसी डरावनी तस्वीर है जिसे देखकर रूह कांप जाती है। एक माँ, जिसे बच्चे की सुरक्षा का सबसे बड़ा ढाल माना जाता है, वही अपनी ममता को त्यागकर काल बन गई। इस पूरी त्रासदी की जड़ में कोई पुरानी रंजिश या दुश्मनी नहीं, बल्कि सोशल मीडिया का वह आधा-अधूरा ज्ञान और भ्रम था, जिसने एक स्वस्थ दिमाग को मौत के डर से भर दिया। 


संजू देवी, जो खुद अपने बच्चों के साथ इंस्टाग्राम पर खुशहाल वीडियो बनाया करती थी, वह रील्स की दुनिया में इस कदर खो गई कि उसने मोबाइल स्क्रीन पर देखे गए एक साधारण लक्षण को अपनी अंतिम सच्चाई मान लिया। मुँह के छालों को कैंसर समझकर वह इस कदर घबरा गई कि उसे अपनी मौत का यकीन हो गया। लेकिन विडंबना देखिए, अपनी मौत के डर से ज्यादा उसे इस बात की चिंता हुई कि उसके जाने के बाद उसके मासूम बच्चों का क्या होगा? इसी भ्रमित ममता के चलते उसने एक खौफनाक फैसला लिया—बच्चों को साथ ले जाने का। 

11 जनवरी की वह सुबह मानपुरा गांव के लिए कभी न भूलने वाला काला दिन बन गई। संजू ने पहले अपनी 12 साल की बेटी नेहा का गला घोंटा, और फिर 7 साल के बेटे भैरू के साथ वही क्रूरता दोहराई। जब उसका मन इतने से भी नहीं भरा, तो उसने टेंट गाड़ने वाली लोहे की कीलों से उनके कोमल शरीरों पर तब तक वार किए, जब तक उनकी अंतिम सांसें थम नहीं गईं। हत्या के बाद उसने अपने पति को फोन कर जो कहा, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को झकझोर सकता है—मैंने दोनों बच्चों को मार दिया है, अब मैं भी जा रही हूँ। 

पड़ोसियों ने जब घर की छत से अंदर प्रवेश किया, तो वहां का दृश्य किसी दुस्वप्न जैसा था। खून से लथपथ मासूमों के शव पड़े थे और पास ही वह माँ बेसुध थी, जिसने अपनी ही दुनिया उजाड़ दी थी। पुलिस की जांच में सामने आया कि संजू को कैंसर था या नहीं, इसकी कोई चिकित्सीय पुष्टि नहीं हुई है। यह सब केवल एक वर्चुअल डर था जिसे उसने रील देखकर सच मान लिया था। 

यह घटना चीख-चीख कर हमें चेतावनी दे रही है कि सोशल मीडिया की रील्स और अल्गोरिदम हमें मानसिक रूप से कितना कमजोर बना रहे हैं। हम स्क्रीन पर दिखने वाली जानकारी को खुदा मान लेते हैं, पर अपनों से बात करना और डॉक्टर की सलाह लेना भूल जाते हैं। संजू देवी का मामला समाज के लिए एक कड़ा सबक है कि अगर हमने तकनीक और हकीकत के बीच की रेखा को नहीं पहचाना, तो इसी तरह की डिजिटल बीमारियां हमारी आने वाली नस्लों को निगलती रहेंगी। आज भीलवाड़ा के उस घर में केवल सन्नाटा है, जो यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर उन मासूमों का क्या कसूर था?

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