
मृदंगम की दुनिया में महिलाओं के लिए राह बनाने वाली अग्रणी कलाकार थीं निदुमोलु सुमति, बनीं लय और ताल की अग्रदूत
नई दिल्ली। जिस मृदंगम के ऊपर लय और ताल पर हमेशा से पुरुषों का राज रहा, किसी ने शायद ही सोचा होगा कि एक महिला इस सोच को अपनी थाप से तोड़ सकती है। मृदंगम को हमेशा से पुरुष वादकों का वाद्य माना जाता रहा, जहां महिलाओं के लिए जगह तक नहीं थी, लेकिन निदुमोलु सुमति देश की पहली ऐसी महिला हैं, जिन्होंने पेशेवर मृदंगम वादकों के पुरुष-प्रधान क्षेत्र में अपनी जगह बनाई।
निदुमोलु सुमति का जन्म 16 अक्टूबर 1950 को आंध्र प्रदेश के एलुरु में हुआ। वह निदुमोलू राघवैय्या की बेटी हैं, जो मृदंगम वादन में माहिर थे। सुमति ने छह साल की उम्र में अपने पिता निदुमोलु राघवैय्या से मृदंगम सीखना शुरू किया था। सुमति को वाद्य यंत्रों से बहुत लगाव था और कला में महारत हासिल करने के लिए वह घंटों अभ्यास करती थीं।
मृदंगम पर पड़ती हर थाप कुछ इस तरह गूंजती थी, जैसे लय खुद उनके इशारों पर थिरक रही हो।
उनके पिता, दंडमुडी राममोहन राव के वाद्ययंत्र बजाने के अंदाज से बहुत प्रभावित थे, इसलिए उन्होंने सुमति को उनके मार्गदर्शन में सीखने के लिए भेज दिया। 1964 से उन्होंने दंडमुडी राममोहन राव से प्रशिक्षण लिया, जिनसे बाद में उन्हीं से विवाह कर लिया।
आज भी सुमति उन्हें ज्ञान का भंडार और एक कुशल वाद्य वादक के रूप में याद करती हैं।
उन्होंने आगे चलकर लय वेदिका की स्थापना की, जिसका नाम अब उनके पति दंडमुदी राममोहन राव की स्मृति में रखा गया है। सुमति ने भारत और विदेशों में कई प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में हिस्सा लिया। उन्होंने एमएस सुब्बुलक्ष्मी, डॉ एम बालमुरलीकृष्ण और पंडित भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों के साथ संगत की।
वह भारत की पहली पेशेवर महिला मृदंगम वादकों में से एक और पहली महिला लय विन्यासम कलाकार बनीं।
उनके करियर ने यह दिखाया कि यह रास्ता न सिर्फ मंच तक ले जा सकता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर पहचान और अध्यापन के जीवन की ओर भी ले जा सकता है। संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें 2009 के पुरस्कार के लिए चुना और सितंबर 2010 में यह सम्मान सुमति को दिया गया। इसके बाद 2021 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। -आईएएनएस
अनचाहे बालों को हटाना अब मुसीबत नहीं...
5 कमाल के लाभ बाई करवट सोने के...
गोपी बहू कितना ग्लैमर अवतार देखकर चौंक जाएंगे आप!






