बोलते वक्त शब्द हों नपे-तुले

बोलते वक्त शब्द हों नपे-तुले

आज की लाइफस्टाइल में जहां एक-दूसरे को मान-सम्मान देने की परंपरा कम होती जा रही है, वहीं शब्दों को नाप-तौल कर बोलने का भी रिवाज नहीं रहा। अगर इसका विरोध दर्ज कराया जाए तो जवाब मिलता है, हमें तो सीधी बात करना ही आता है, जो कहते हैं मुंह पर ही कह देते हैं आप कह तो देती हैं, लेकिन क्या आपने कभी यह सोचने की जहमत भी उठाई है कि आपकी कथित सीधी-खरी बात आपको अपने नजदीकी रिश्तों से कितना दूर कर रही है। अगर कोई आपसे ऎसे बोलेगा तो क्या आपको बुरा नहीं लगेगा। लेकिन जिन महिलाओं को शब्दों के बाण फेंकने की आदत होती है, वे धीरे-धीरे अपनों से कटती जाती हैं। ऊपरी दिखावे में बेशक सम्मान मिल जाए, लेकिन दिल से प्यार उन्हीं को मिलता है जो कटाक्ष करने से बचती हैं और अपनी बात को सलीके से कहती हैं। दरअसल, हम बाहर से अच्छे बने रहते हैं। लोग हमारे व्यवहार की तारीफ करते हैं। जो हमारे कुछ नहीं लगते, उनकी सोच हमारे लिए मायने रखती है, लेकिन जो हमारे अपने होते हैं हम उन्हें ही हल्के में लेते हैं। अपनी खीज, झल्लाहट और हताशा का शिकार हम अपनों को ही बना लेते हैं। जबकि वे हकदार होते हैं हमारे प्यार, समर्पण और सम्मान के।


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