विदेशी बाजारों में मचा देसी चारपाई का डंका सादगी से लक्जरी तक का अनोखा सफर

विदेशी बाजारों में मचा देसी चारपाई का डंका सादगी से लक्जरी तक का अनोखा सफर

ज के आधुनिक दौर में जहाँ भारी भरकम सोफे और गद्देदार बेड का बोलबाला है वही भारत की पारंपरिक चारपाई सात समंदर पार अपनी एक नई और रॉयल पहचान बना रही है। जिसे कभी हम ग्रामीण भारत की जीवनरेखा मानते थे वह अब विदेशों के आलीशान शोरूम में इंडियन डे बेड के नाम से हजारों डॉलर में बिक रही है। 

पिछले कुछ वर्षों में ऑस्ट्रेलिया अमेरिका और यूरोप के देशों में चारपाई का क्रेज तेजी से बढ़ा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण सस्टेनेबिलिटी है क्योंकि आज की दुनिया ऐसे फर्नीचर की तलाश में है जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाए। लकड़ी और सूती या जूट की रस्सियों से बनी यह खाट इस मानक पर पूरी तरह खरी उतरती है। 

चारपाई केवल बैठने या सोने का साधन मात्र नहीं है बल्कि इसके पीछे गहरा विज्ञान छिपा है। इसके बुने हुए ढांचे पर सोने से शरीर के दबाव बिंदु यानी प्रेशर पॉइंट्स संतुलित रहते हैं जिससे रक्त संचार बेहतर होता है। सख्त गद्दों की तुलना में चारपाई की लचीली बुनावट कमर और रीढ़ की हड्डी के लिए अधिक आरामदायक मानी जाती है। 

इसके अलावा चारपाई के नीचे से हवा का प्राकृतिक बहाव बना रहता है जो इसे गर्मियों के लिहाज से दुनिया का सबसे बेहतरीन बेड बनाता है। ग्रामीण भारत में अक्सर कहा जाता है कि चारपाई पर सिर ऊँचा करके लेटने से पाचन प्रक्रिया में भी मदद मिलती है। 

चारपाई भारतीय ग्रामीण संस्कृति का केंद्र बिंदु है जो चौपाल की जान मानी जाती है जहाँ बैठकर सामूहिक निर्णय लिए जाते हैं। यह हमारी मेहमाननवाजी का प्रतीक है जहाँ घर आए अतिथि को सबसे पहले चारपाई ही दी जाती है। आज जब दुनिया मिनिमलिज्म यानी न्यूनतमवाद की ओर बढ़ रही है तो चारपाई का महत्व और बढ़ गया है।  विदेशों में इसका बढ़ता चलन यह साबित करता है कि हमारी पारंपरिक चीजें न केवल वैज्ञानिक रूप से श्रेष्ठ हैं बल्कि आधुनिक सौंदर्यशास्त्र में भी फिट बैठती हैं। यह समय अपनी विरासत पर गर्व करने और इसे सहेजने का है। 

- हेमलता शर्मा, जयपुर

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