बहू जो भाभी भी है, देवर और ननद के साथ दोस्त जैसा रिश्ता बनाने की कोशिश करती है

बहू जो भाभी भी है, देवर और ननद के साथ दोस्त जैसा रिश्ता बनाने की कोशिश करती है

भारतीय परिवारों में एक स्त्री जब विवाह के बाद नए घर में आती है, तो वह सिर्फ बहू बनकर नहीं आती, वह धीरे धीरे भाभी भी बन जाती है। देवर के लिए अपनापन, ननद के लिए स्नेह, सास ससुर के लिए सम्मान, और पति के लिए समर्पण। इन सभी रिश्तों को वह एक साथ जीती है, बिना किसी शोर के, बिना किसी हिसाब के। 

वह घर के हर छोटे बड़े काम में शामिल होती है, चाहे परिवार पास हो या दूर, वह हर किसी के लिए अपने हिस्से से थोड़ा ज्यादा देती है। धीरे धीरे वह इस घर की आदत बन जाती है, एक ऐसी उपस्थिति जो हर जगह होती है, लेकिन अक्सर दिखाई नहीं देती। यहीं से एक खामोश सच्चाई शुरू होती है। कई बार उसके किए गए कामों को सहज मान लिया जाता है, जैसे वह उसका कर्तव्य ही हो। जब किसी काम का श्रेय देने की बात आती है, तो उसका नाम कहीं पीछे छूट जाता है। कभी वह किसी काम की वजह बनती है, पर पहचान किसी और के हिस्से में चली जाती है। 

देवर और ननद के साथ वह एक दोस्त जैसा रिश्ता बनाने की कोशिश करती है, हर खुशी में साथ खड़ी रहती है, हर जरूरत में आगे बढ़ती है। लेकिन जब उसके अपने जीवन के खास पल आते हैं, तो प्रतिक्रियाएं अक्सर बहुत सीमित रह जाती हैं, जैसे उसकी खुशी उतनी जरूरी नहीं। वह कुछ कहती नहीं, लेकिन मन में एक हल्की सी दूरी बन जाती है। यह दूरी किसी अधिकार या संपत्ति की नहीं होती, यह दूरी सिर्फ व्यवहार और भावनाओं की होती है। फिर भी वह अपने संस्कारों के कारण पीछे नहीं हटती, वह रिश्तों को निभाना नहीं छोड़ती। 

वह मुस्कुराती है, सहज रहती है, और हर रिश्ते को जोड़ने की कोशिश करती है। लेकिन एक और सच है जो अक्सर अनदेखा रह जाता है। जब उसका समय कठिन होता है, जब उसे सच में सहारे की जरूरत होती है, तब कई बार उसकी भावनाओं को यह कहकर हल्का कर दिया जाता है कि तुम इतना क्यों सोचती हो, ऐसा क्या हो गया। जबकि उसी समय, सिर्फ एक छोटा सा साथ, एक वाक्य, हम हैं तुम्हारे साथ, उसके अंदर बहुत कुछ संभाल सकता है। 

हर संघर्ष दिखता नहीं, कई लड़ाइयाँ वह अकेले लड़ती है, बिना आवाज के, बिना शिकायत के। और फिर जब वही इंसान समय के साथ खुद को संभालना सीख लेता है, थोड़ा मजबूत हो जाता है, तो उसके इस बदलाव को अक्सर गलत समझ लिया जाता है। कहा जाता है, अब तुम बदल गए हो। जबकि सच यह होता है, वह बदली नहीं, वह बस अपने अनुभवों के साथ जीना सीख गई है। अंत में बात बस इतनी सी है। 

अगर आप किसी की बेटी को अपने घर में लाते हैं, तो उसे आधा नहीं, पूरा अपनाइए। ऐसा नहीं कि सुविधा के समय वह अपनी लगे, और संवेदनाओं के समय वह पराई हो जाए। रिश्ते चयन से नहीं, निरंतरता से बनते हैं। क्योंकि हम हैं तुम्हारे साथ, यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, किसी के पूरे जीवन को हल्का कर देने वाला एहसास होता है। जहाँ यह एहसास होता है, वहीं रिश्ते सच में बसते हैं।

#क्या सचमुच लगती है नजर !