Parenting : रील्स और शॉर्ट्स का डोपामाइन लूप कैसे बच्चों की याददाश्त को खोखला कर रहा है डिजिटल स्क्रीन का नशा

Parenting : रील्स और शॉर्ट्स का डोपामाइन लूप कैसे बच्चों की याददाश्त को खोखला कर रहा है डिजिटल स्क्रीन का नशा

आज के डिजिटल युग में बच्चों का बचपन मैदानों से सिमटकर मोबाइल स्क्रीन के स्क्रॉल बार पर आ गया है। कोरोना महामारी के बाद से देश और दुनिया में कंटेंट देखने के तौर तरीकों में एक खतरनाक बदलाव आया है। आज इंटरनेट पर राज कर रहे 15 से 30 सेकंड के शॉर्ट फॉर्म वीडियो और रील्स बच्चों के दिमाग के लिए मानसिक जंक फूड Mental Junk Food बनते जा रहे हैं। 

यह धीमा जहर उनके सोचने समझने की क्षमता और याददाश्त को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार लगातार स्क्रॉलिंग की यह लत बच्चों के मानसिक विकास को उस उम्र में प्रभावित कर रही है जब उनका दिमाग सबसे ज्यादा संवेदनशील होता है। 

डोपामाइन ट्रैप क्यों रील्स के आगे फीकी पड़ रही है पढ़ाई: 

चिकित्सकीय भाषा में कहें तो जब कोई बच्चा लगातार तेज गति वाले शॉर्ट वीडियो देखता है तो हर नए स्वाइप के साथ उसके दिमाग में डोपामाइन Dopamine नाम का न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज होता है। यह केमिकल दिमाग को तुरंत खुशी और रिवॉर्ड का अहसास कराता है। अटेंशन स्पैन का घटना दिमाग को बहुत कम समय में कुछ ही सेकंड्स में जानकारी और मनोरंजन का आदी बनाया जा रहा है। 

धैर्य की कमी इस त्वरित उत्तेजनाः 
Instant Gratification के कारण बच्चों को किताबें पढ़ना होमवर्क करना या किसी गंभीर विषय पर लगातार सोचना उबाऊ और थकाऊ लगने लगता है। फोकस में गिरावट जिन कामों में गहरे ध्यान या सब्र की जरूरत होती है वहां बच्चे बहुत जल्दी अपनी एकाग्रता खो देते हैं। 

इन शुरुआती चेतावनी संकेतों को पहचानें रेड फ्लैग्सः 

माता पिता को अपने बच्चों में दिख रहे इन लक्षणों के प्रति तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। अत्यधिक बेचैनी स्मार्टफोन न मिलने या इंटरनेट बंद होने पर चिड़चिड़ापन होना। याददाश्त में कमजोरी बहुत जल्दी बातें या पढ़ाई हुई चीजें भूल जाना। एकाग्रता का अभाव किसी एक जगह या काम पर 10 15 मिनट भी ध्यान न लगा पाना। सामाजिक दूरी दोस्तों के साथ बाहर खेलने जाने या परिवार के साथ बैठने में दिलचस्पी खत्म होना। 

गैजेट्स छीनना समाधान नहीं डिजिटल डिटॉक्स है जरूरीः 

विशेषज्ञों की सलाह समस्या का हल बच्चों से जबरन फोन छीनना या उन पर पूरी तरह पाबंदी लगाना नहीं है क्योंकि इससे उनमें विद्रोह की भावना पनप सकती है। इसकी जगह एक स्वस्थ डिजिटल बैलेंस बनाना जरूरी है। बोरियत भी है जरूरी बच्चों के मानसिक विकास के लिए कभी कभी उनका खाली बैठना या बोर होना भी जरूरी है। 

बोरियत ही बच्चों में रचनात्मकता और कुछ नया सोचने की क्षमता को जन्म देती है। वैकल्पिक आदतें बच्चों को मैदानी खेल किताबें पढ़ने की आदत संगीत चित्रकारी या किसी नई हॉबी की तरफ प्रेरित करें। स्क्रीन फ्री टाइम घर में भोजन के समय और सोने से कम से कम एक घंटे पहले नो गैजेट ज़ोन का नियम सख्ती से लागू करें।
 शॉर्ट वीडियो का मज़ा कुछ सेकंड का हो सकता है लेकिन इसका असर बच्चे के पूरे भविष्य पर पड़ सकता है। तकनीक का इस्तेमाल सीखने के लिए हो न कि दिमाग को सुस्त बनाने के लिए—यही आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। 

-हेमलता शर्मा, जयपुर


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