Love & Romance : व्यवहार या पुकार समझिए अपने बच्चे की खामोश भाषा

Love & Romance : व्यवहार या पुकार समझिए अपने बच्चे की खामोश भाषा

अक्सर माता-पिता बच्चों के गुस्से या चिड़चिड़ेपन को केवल जिद या बदतमीजी मान लेते हैं। लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हर नखरे के पीछे मदद की एक पुकार छिपी हो सकती है। बच्चे हमेशा शब्दों में नहीं कह पाते कि उन्हें क्या चाहिए इसलिए वे व्यवहार को अपना जरिया बनाते हैं। 

उम्र के साथ बदलते संकेतों की पहचान: 

शैशवावस्था (0-2 साल: 
इस उम्र में बच्चे रोकर चिपककर या खाने में अरुचि दिखाकर अपनी असुरक्षा जताते हैं। उन्हें शब्दों से ज्यादा आपके स्पर्श और शारीरिक मौजूदगी की जरूरत होती है। 

बचपन की शुरुआत 3-5 साल: 
मैं नहीं कर सकता" कहना या अचानक नखरे दिखाना असल में उनके डर का संकेत है। उन्हें डांटने के बजाय धैर्य से सुनना उन्हें अपनी भावनाओं को काबू करना सिखाता है। 

स्कूली उम्र 6-9 साल: 
पेट दर्द का बहाना या स्कूल जाने से पहले रोना अक्सर अकेलेपन या चिंता का लक्षण होता है। उन पर आरोप लगाने के बजाय कहें चलो थोड़ा साथ बैठते हैं शायद आप कुछ परेशान हो। 

किशोरावस्था की दहलीज 10-12 साल: 
मैं ठीक हूँ कहकर बात टालना या कमरे में बंद रहना इस उम्र की पहचान है। उन्हें प्राइवेसी स्पेस भी दें और साथ होने का भरोसाभी दिलाते रहें। 

टीनएज का दौर 13-16 साल: 

गुस्सा और विद्रोह अक्सर अंदरूनी उलझन का नतीजा होते हैं। इन्हें अनुशासन से नहीं बल्कि बिना शर्त प्यार और विश्वास से ही सुलझाया जा सकता है। 

युवावस्था 17-25 साल: 
इस उम्र में मदद मांगना बहुत बारीक हो जाता है। अत्यधिक काम में डूबे रहना या अचानक थकान महसूस करना संकेत है कि वे दबाव में हैं। उनके साथ अपनी पुरानी समस्याएं साझा करें ताकि वे आपसे अपनी बात कह सकें। 

अभिभावकों के लिए कुछ खास सुझाव: 

इन कुछ बिंदुओं को अपनी परवरिश का हिस्सा जरूर बनाएं: 

सक्रिय श्रवण: 
जब बच्चा कुछ कहे तो फोन छोड़कर उसकी आंखों में देखकर बात करें। इससे उसे महसूस होता है कि वह आपकी प्राथमिकता है। 

गलतियों को सीख बनाएं: 
अगर बच्चा कुछ गलत करता है तो उसे अपराधी महसूस कराने के बजाय यह सिखाएं कि उस स्थिति को ठीक कैसे करना है। 

अपनी भावनाओं को छिपाएं नहीं: 
माता-पिता को भी कभी-कभी अपनी थकान या उदासी बच्चों के सामने मर्यादा में जाहिर करनी चाहिए। इससे बच्चे सीखते हैं कि भावनाएं व्यक्त करना कमजोरी नहीं बल्कि इंसान होने का हिस्सा है। 

तुलना से बचें: 
हर बच्चे का व्यक्तित्व अलग होता है। दूसरे बच्चों से तुलना करना उनके आत्मविश्वास को तोड़ देता है और वे आपसे दूरी बनाने लगते हैं। एक माता-पिता के रूप में आपका काम केवल प्रतिक्रिया देना नहीं बल्कि यह समझना है कि उस व्यवहार के पीछे की असली भावना क्या है। जब बच्चा भावनात्मक रूप से सुरक्षित महसूस करता है, तो वह खुद-ब-खुद अपनी समस्याएं आपसे साझा करने लगता है। 
-हेमलता शर्मा, जयपुर

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