
घर की दहलीज लांघते समय पीछे से पुकारना क्यों माना जाता है विघ्नकारी, जानिए इसके शास्त्रीय रहस्य और बचाव के अचूक तरीके
सनातन धर्म और वास्तु विज्ञान में दैनिक जीवन से जुड़े अनेक नियम बताए गए हैं जिनका सीधा असर व्यक्ति की उन्नति और मानसिक स्थिति पर पड़ता है। अक्सर किसी महत्वपूर्ण कार्य नौकरी के साक्षात्कार या लंबी यात्रा पर निकलते समय बुजुर्ग घर से बाहर कदम रखते ही पीछे से आवाज न देने की सलाह देते हैं। सामान्य बोलचाल में इसे भले ही पुरानी धारणा मान लिया जाए परंतु इसके पीछे गहरे ज्योतिषीय और व्यावहारिक कारण निहित हैं।
शुभ संकल्प में बाधा का प्रतीक
वास्तु सिद्धांतों के अनुसार जब कोई व्यक्ति किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए घर से प्रस्थान करता है, तो वह एक सकारात्मक ऊर्जा और दृढ संकल्प के साथ आगे बढ़ता है। ऐसे समय में अचानक पीछे से दी गई पुकार उस सकारात्मक प्रवाह को तोड़ देती है। इससे व्यक्ति के मन में संशय उत्पन्न होता है जिससे बनते हुए कार्यों में विलंब या रुकावट की स्थिति बन जाती है।
राहु का प्रभाव और नकारात्मकता का प्रवेश
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से निकलते समय अचानक रुकावट पैदा होना राहु के अशुभ प्रभाव को दर्शाता है। माना जाता है कि शुभ यात्रा के समय व्यक्ति के चारों ओर एक सुरक्षा कवच निर्मित होता है। टोकने से वह सुरक्षा चक्र प्रभावित होता है और नकारात्मक ऊर्जा हावी होने लगती है। इसके परिणामस्वरूप यात्रा या कार्य के दौरान दुर्घटना धन हानि या असफलता का भय बढ़ जाता है।
मां लक्ष्मी की अप्रसन्नता और आर्थिक हानि
धार्मिक मान्यताओं में मुख्य द्वार को समृद्धि का प्रतीक माना गया है। घर की दहलीज पार करते समय विघ्न उत्पन्न होने से आर्थिक प्रगति में बाधा आती है। ऐसा होने पर व्यापार में घाटा या कार्यक्षेत्र में नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा अचानक आई आवाज से व्यक्ति का ध्यान भटकता है जिससे उसका आत्मविश्वास भी कमजोर हो जाता है।
अशुभ प्रभाव से बचने के सरल और अचूक उपाय
यदि जाने-अनजाने में निकलते समय कोई पीछे से पुकार ले तो घबराने के बजाय शास्त्रों में बताए गए इन आसान नियमों का पालन करना चाहिए:
पुनः घर के अंदर आ जाएं: टोक सुनने के तुरंत बाद आगे बढ़ने के बजाय वापस लौट आएं।
विराम दें और जल पिएं: घर में प्रवेश करके दो मिनट शांत बैठें और थोड़ा सा जल ग्रहण करें।
इष्टदेव का स्मरण करें: अपने आराध्य देव का ध्यान करें और मन को शांत करके पुनः प्रसन्नचित्त होकर बाहर निकलें।
इस साधारण प्रक्रिया को अपनाने से नकारात्मक प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाता है और कार्य सिद्ध होने की संभावना बढ़ जाती है।
हेमलता शर्मा जयपुर
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