
दुनिया जिन्हें मानती है परफेक्ट वे खुद को क्यों समझते हैं ऑर्डिनरी जानिए खूबसूरत लोगों का माइंड गेम
अक्सर हम अपने आसपास कुछ ऐसे लोगों को देखते हैं जिनकी पर्सनैलिटी लुक्स और स्टाइल के सब दीवाने होते हैं। लोग उनकी खूबसूरती की तारीफ करते नहीं थकते लेकिन जब खुद उनसे बात करो तो वे बेहद साधारण या हीनभावना से भरे नज़र आते हैं।
सवाल यह उठता है कि जिस इंसान को पूरी दुनिया आकर्षक मानती है वह खुद को आईने में देखकर खूबसूरत क्यों नहीं महसूस कर पाता। क्या यह सिर्फ उनका बड़प्पन है या इसके पीछे कोई गहरा मनोवैज्ञानिक कारण है। मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के विशेषज्ञ इसे ब्यूटी पैराडॉक्स कहते हैं। आइए समझते हैं इसके पीछे के असली कारण।
इम्पोस्टर सिंड्रोम और बचपन की पुरानी यादें
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार इंसान का सेल्फ इमेज उम्र के साथ तो बदलता है लेकिन उसका दिमाग अक्सर बचपन में ही अटका रह जाता है। अगर किसी व्यक्ति को स्कूल या घर में उसके रंग वजन या लुक्स को लेकर कभी टोका या चिढ़ाया गया हो तो वह बात उसके अवचेतन मन में बैठ जाती है। आगे चलकर भले ही उसका लुक बदल जाए और लोग उसकी खूबसूरती के कसीदे पढ़ने लगें लेकिन उसका दिमाग खुद को उसी पुराने रूप में देखता है। इसे लुक्स का इम्पोस्टर सिंड्रोम भी कहा जाता है जहाँ इंसान को लगता है कि लोग उसकी झूठी तारीफ कर रहे हैं।
स्पॉटलाइट इफ़ेक्ट और सिंगल फ्लॉ पर फोकस
हम खुद को जिस नज़र से देखते हैं दूसरे हमें उस नज़र से कभी नहीं देखते। हमें लगता है कि हमारी हर छोटी कमी पर सबकी नज़र है जिसे स्पॉटलाइट इफेक्ट कहते हैं। इसके अलावा सुंदर दिखने वाले लोग अक्सर अपने चेहरे की किसी एक छोटी सी कमी जैसे हल्का सा दाग नाक की बनावट या बालों का झड़ना पर इतना ज़्यादा ध्यान केंद्रित कर लेते हैं कि उन्हें अपनी बाकी सारी खूबसूरती दिखना बंद हो जाती है।
सोशल मीडिया का फिल्टर ट्रैप
आज के डिजिटल दौर में खूबसूरत से खूबसूरत इंसान भी बॉडी डिस्मॉर्फिया का शिकार हो रहा है। सोशल मीडिया पर परफेक्ट लाइटिंग एआई फिल्टर्स और फोटो एडिटिंग से सजी तस्वीरों को देखकर लोग अनजाने में अपनी तुलना उनसे करने लगते हैं। जब वे आईने में अपना बिना फिल्टर वाला असली चेहरा देखते हैं तो उन्हें खुद में कमियां नज़र आने लगती हैं।
एक कड़वा अनुभव दस तारीफों पर भारी
मानव दिमाग का यह नियम है कि वह सकारात्मक बातों के मुकाबले नकारात्मक यादों को ज़्यादा संभालकर रखता है। अगर किसी व्यक्ति को अतीत में प्यार या किसी रिश्ते में रिजेक्शन मिला हो तो वह एक बुरा अनुभव उसकी आत्म छवि को तोड़ देता है। इसके बाद चाहे दस लोग भी उसकी सुंदरता की तारीफ करें वह एक रिजेक्शन का दर्द उन सभी तारीफों पर भारी पड़ता है।
आकर्षण सिर्फ फेस वैल्यू नहीं होता
साइकोलॉजी मानती है कि असली आकर्षण सिर्फ चेहरे की बनावट में नहीं होता। व्यक्ति का बात करने का तरीका उसकी मुस्कान और हँसमुख स्वभाव उसकी बॉडी लैंग्वेज और पॉजिटिव एनर्जी ये तमाम चीज़ें मिलकर किसी इंसान को दूसरों की नज़र में आकर्षक बनाती हैं। चूँकि इंसान अपनी इन खूबियों को खुद महसूस नहीं कर पाता इसलिए वह खुद को साधारण समझता है जबकि दुनिया उसकी इसी ओवरऑल वाइब की दीवानी होती है।
सच्चाई क्या है
खूबसूरती का कोई तय पैमाना नहीं होता। अगर कोई आपकी तारीफ करता है तो उसमें कोई हिडन एजेंडा ढूंढने के बजाय उसे मुस्कुराकर स्वीकार करना सीखें। दूसरों के बनाए स्टैंडर्ड्स से खुद को तौलना बंद करें क्योंकि आपकी असल खूबसूरती आपके आत्मविश्वास और आपकी पहचान में छिपी है।
हेमलता शर्मा जयपुर
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