बच्चे के सामने हर समय फोन चलाना क्यों पड़ सकता है भारी? पैरेंटिंग में पहले खुद बदलें ये आदत

बच्चे के सामने हर समय फोन चलाना क्यों पड़ सकता है भारी? पैरेंटिंग में पहले खुद बदलें ये आदत

आज के समय में फोन हमारी जिंदगी का जरूरी हिस्सा बन चुका है। काम हो, मनोरंजन हो या किसी से बातचीत, ज्यादातर चीजों के लिए हम मोबाइल पर निर्भर हैं। लेकिन जब यही आदत बच्चों के सामने लगातार बनी रहती है, तो इसका असर उनकी सोच और व्यवहार पर पड़ सकता है। बच्चे सिर्फ हमारी कही बातों से नहीं, बल्कि हमारे रोज के व्यवहार को देखकर भी बहुत कुछ सीखते हैं। अगर माता-पिता हर खाली समय में फोन स्क्रीन पर व्यस्त दिखाई देते हैं, तो बच्चे भी स्क्रीन को सामान्य और जरूरी चीज मानने लग सकते हैं। इसका असर उनके साथ बिताए समय, बातचीत और ध्यान देने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। इसलिए अच्छी पैरेंटिंग की शुरुआत बच्चे को फोन से दूर रखने से पहले खुद अपनी फोन की आदतों को समझने और बदलने से होती है।
 बच्चा आपकी बातों से ज्यादा आपका व्यवहार नोट करता है
माता-पिता अक्सर बच्चों को फोन कम चलाने की सलाह देते हैं, लेकिन अगर बच्चा खुद देख रहा है कि पेरेंट्स हर थोड़ी देर में मोबाइल चेक कर रहे हैं, तो उसके लिए बात और उदाहरण में फर्क समझना मुश्किल हो जाता है। बच्चे के लिए माता-पिता का व्यवहार एक तरह का मॉडल होता है। इसलिए सिर्फ यह कहना कि ‘फोन मत चलाओ’ उतना असरदार नहीं होगा, जितना खुद कुछ समय के लिए फोन को किनारे रखकर दिखाना। जब बच्चा देखता है कि उसके सामने बैठने पर माता-पिता स्क्रीन से ज्यादा बातचीत को महत्व दे रहे हैं, तो उसे भी वही व्यवहार स्वाभाविक लगने लगता है।
फोन की वजह से बच्चे की छोटी कोशिशें अनदेखी हो सकती हैं
बच्चे लगातार कुछ नया सीखते और बताते रहते हैं। वह अपनी बनाई ड्राइंग दिखा सकता है, कोई कहानी सुना सकता है या दिनभर की कोई छोटी घटना बताने के लिए आपके पास आ सकता है। उस समय माता-पिता का फोन में व्यस्त रहना बच्चे को यह महसूस करा सकता है कि उसकी बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। हर बार ऐसा होने से बच्चे का उत्साह धीरे-धीरे कम हो सकता है। इसलिए जब बच्चा खुद बातचीत शुरू करे, तो कुछ मिनट के लिए फोन नीचे रखकर उसकी तरफ देखना बहुत मायने रखता है। उसे पूरा ध्यान देना महंगे खिलौने से ज्यादा यादगार अनुभव दे सकता है।
हर खाली पल को स्क्रीन से भरने की आदत बच्चे में भी आ सकती है
अगर घर में इंतजार करते समय, खाना खाने के दौरान या आराम के वक्त हर कोई मोबाइल निकाल लेता है, तो बच्चे के लिए बिना स्क्रीन के खाली बैठना असहज लग सकता है। जबकि बोरियत भी बच्चों के विकास का हिस्सा है। इसी दौरान वे खुद से खेलना, कल्पना करना, चीजों को नोटिस करना और नए तरीके से समय बिताना सीखते हैं। इसलिए घर में कुछ ऐसे समय जरूर रखें जब टीवी और मोबाइल दोनों से दूरी हो। शुरुआत में बच्चा परेशान हो सकता है, लेकिन धीरे-धीरे उसे बिना स्क्रीन के भी समय बिताने की आदत विकसित होने लगेगी।
 बच्चे के सामने फोन का इस्तेमाल करने के अपने नियम बनाएं
फोन पूरी तरह छोड़ देना हर माता-पिता के लिए संभव नहीं है, क्योंकि काम और जरूरी संपर्क भी मोबाइल से जुड़े होते हैं। इसलिए व्यावहारिक तरीका यह है कि घर में कुछ स्पष्ट नियम बनाए जाएं। जैसे बच्चे से बातचीत के दौरान फोन न देखना, खाने की टेबल पर मोबाइल अलग रखना या सोने से पहले परिवार के लिए स्क्रीन-फ्री समय तय करना। इन नियमों का पालन केवल बच्चों से करवाने के बजाय माता-पिता भी करें। जब नियम पूरे परिवार पर समान रूप से लागू होते हैं, तो बच्चा उन्हें सजा या रोक-टोक की तरह नहीं, बल्कि घर की सामान्य आदत की तरह स्वीकार करता है।
कभी-कभी खुद से पूछें अभी फोन जरूरी है या सिर्फ आदत?
फोन उठाने से पहले खुद से एक छोटा सवाल पूछना काफी मददगार हो सकता है।क्या मुझे अभी सच में फोन की जरूरत है या मैं सिर्फ आदतन स्क्रीन देख रही हूं? कई बार हम बिना किसी खास काम के बार-बार मोबाइल खोल लेते हैं। यही छोटे-छोटे बदलाव पैरेंटिंग में बड़ा फर्क ला सकते हैं। अगर बच्चे के सामने आपका ध्यान बार-बार फोन से हटकर उसकी ओर आने लगे, तो उसे सिर्फ ज्यादा समय नहीं मिलेगा, बल्कि यह संदेश भी मिलेगा कि रिश्तों और बातचीत की अपनी अहमियत होती है। बच्चे को स्क्रीन से दूर रखने की शुरुआत अक्सर उसके हाथ से फोन छीनने से नहीं, बल्कि अपने हाथ से फोन नीचे रखने से होती है।

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