नंबर वन लाने की जिद कहीं बच्चे को डिप्रेशन में न धकेल दे जानिए पेरेंटिंग की वो गलतियां जो बच्चों का आत्मविश्वास तोड़ देती हैं

नंबर वन लाने की जिद कहीं बच्चे को डिप्रेशन में न धकेल दे जानिए पेरेंटिंग की वो गलतियां जो बच्चों का आत्मविश्वास तोड़ देती हैं

​हर माता-पिता का यह सपना होता है कि उनका बच्चा जीवन की दौड़ में सबसे आगे रहे। अपने बच्चे को तरक्की करते देखना दुनिया का सबसे खूबसूरत अहसास है। लेकिन आज के इस प्रतिस्पर्धी दौर में कई बार पेरेंट्स बच्चों पर सफलता का एक ऐसा अदृश्य दबाव बना देते हैं जो उनके कोमल मन को अंदर से पूरी तरह तोड़ देता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे पुशी पेरेंटिंग कहा जाता है। यह तरीका बच्चों के सुनहरे भविष्य को संवारने के बजाय उनकी मानसिक सेहत और आत्मविश्वास को बहुत नुकसान पहुँचाता है। आइए जानते हैं पेरेंटिंग की उन गलतियों के बारे में जिनसे आप समझ सकते हैं कि कहीं आप भी इसी राह पर तो नहीं चल रहे हैं।

​हर समय नंबर वन रहने की जिद
​क्या आपके लिए बच्चे की मानसिक खुशी से ज्यादा उसका रिपोर्ट कार्ड मायने रखता है। अगर आपका बच्चा बहुत अच्छे नंबर लाता है और आप उसकी सराहना करने के बजाय कटी हुई छोटी सी गलती के लिए उसे डांटते हैं तो यह एक गंभीर संकेत है। जीवन में हारना और अपनी कमियों से सीखना भी उतना ही जरूरी है जितना कि जीतना। हर समय अव्वल आने का मानसिक तनाव बच्चों को डिप्रेशन की ओर धकेल सकता है।

​बच्चे के सपनों पर अपनी पसंद थोपना
​हो सकता है कि आपका बच्चा एक बेहतरीन कलाकार या संगीतकार बनना चाहता हो लेकिन आप उसे जबरन डॉक्टर या इंजीनियर बनाने के लिए दिन-रात दबाव बना रहे हैं। जब माता-पिता बच्चे की अपनी स्वाभाविक प्रतिभा और इच्छा को कुचलकर अपनी अधूरी ख्वाहिशों को उन पर थोपने लगते हैं तो बच्चे अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं और खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं।

​हर मोड़ पर दूसरों से तुलना करना
​पड़ोस वाले शर्मा जी के बेटे को देखो या अपनी बहन से कुछ सीखो यह कुछ ऐसे वाक्य हैं जो अक्सर घरों में सुनने को मिल जाते हैं। लगातार दूसरों के बच्चों से तुलना करने पर बच्चे का आत्मविश्वास पूरी तरह डगमगा जाता है। उसे लगने लगता है कि वह चाहे कितनी भी कोशिश कर ले वह आपके पैमाने पर कभी खरा नहीं उतर पाएगा और यही सोच उसके मन में हीन भावना भर देती है।

​आत्मनिर्भर बनने का मौका न देना
​अगर आप बच्चे के जीवन का हर छोटा-बड़ा फैसला खुद ही लेते हैं जैसे उसे क्या पहनना है किससे दोस्ती करनी है और खाली समय में क्या करना है तो आप उसे मानसिक रूप से कमजोर बना रहे हैं। बच्चों के हर काम में जरूरत से ज्यादा दखल देने से वे कभी भी खुद के फैसले लेना नहीं सीख पाते और उम्र बढ़ने के बाद भी दूसरों पर ही निर्भर रहते हैं।
​शर्तों पर प्यार और शाबाशी देना
​यह सबसे संवेदनशील और खतरनाक पहलू है। जब आप बच्चे को केवल तभी गले लगाते हैं या प्यार जताते हैं जब वह कोई मेडल या ट्रॉफी जीत कर आता है तो बच्चे के दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि आपका प्यार बिना किसी शर्त के नहीं है। बच्चों के मन में यह भरोसा होना बहुत जरूरी है कि जीत हो या हार उनके माता-पिता हर परिस्थिति में उनके साथ खड़े रहेंगे।

​एक नई सोच और सुधार का तरीका
एक अच्छे माता-पिता का असली कर्तव्य बच्चे को अपनी उंगली पकड़कर अपनी मर्जी से चलाना नहीं बल्कि उसे सही और गलत का रास्ता दिखाना है। उन्हें घर में एक ऐसा सुरक्षित और खुला माहौल दें जहां वे अपनी गलतियों से खुलकर सीख सकें। बिना किसी डर के अपनी बात कह सकें और इस दुनिया में अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना सकें।
हेमलता शर्मा जयपुर

#ये बातें भूल कर भी न बताएं गर्लफ्रेंड को...



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