
टीनेजर्स का मी-टाइम या डिप्रेशन का इशारा जब बच्चा खुद को कमरे में बंद करने लगे तो ऐसे संभालें बात
बढ़ती उम्र के साथ बच्चों के स्वभाव में बदलाव आना बेहद स्वाभाविक है। कल तक जो बच्चा पूरे घर में चहकता था अचानक उसका अपने कमरे में घंटों वक्त बिताना अक्सर माता-पिता को चिंता में डाल देता है। पैरेंट्स को लगने लगता है कि कहीं उनका बच्चा किसी तनाव या अकेलेपन का शिकार तो नहीं हो रहा।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक हर बार बच्चे का अकेले रहना किसी खतरे की घंटी नहीं होता। जैसे-जैसे बच्चे किशोरावस्था में कदम रखते हैं वे अपनी पहचान और प्राइवेसी की तलाश करते हैं। इसे बाल मनोविज्ञान में सेल्फ-डिस्कवरी का एक हिस्सा माना जाता है। लेकिन एक सजग माता-पिता होने के नाते आपको यह समझना होगा कि यह सिर्फ प्राइवेसी की चाह है या कोई मानसिक उलझन।
अगर आपका बच्चा भी अकेले रहना पसंद कर रहा है, तो स्थिति को संभालने के लिए अपनाएं ये 5 बेहतरीन पैरेंटिंग टिप्स:
बातचीत का तरीका बदलें कम्युनिकेशन गैप न होने दें
अक्सर माता-पिता बच्चों से सिर्फ पढ़ाई या स्कूल को लेकर घिसे-पिटे सवाल करते हैं जिससे बच्चे हां या ना में जवाब देकर बात खत्म कर देते हैं।
क्या करें: उनसे ओपन-एंडेड सवाल पूछें। जैसे आज दोस्तों के साथ क्या नया हुआ या लंच ब्रेक में आज कौन सी मजेदार बात हुई इससे आपको अंदाजा हो जाएगा कि बच्चा बाहर के माहौल में घुल-मिल रहा है या नहीं।
प्राइवेसी को स्पेस दें शक को नहीं
बार-बार बच्चे के कमरे में झांकना उनकी चीजों की तलाशी लेना या हर बात पर सवाल दागना उनके भीतर विद्रोह की भावना पैदा कर सकता है।
क्या करें: चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट्स का मानना है कि किशोरों को अपने विचारों को सुलझाने के लिए एक पर्सनल स्पेस की जरूरत होती है। उनके इस स्पेस का सम्मान करें ताकि उनका आप पर भरोसा मजबूत हो।
स्वभाव के साथ जबरदस्ती न करें
हर बच्चे की पर्सनैलिटी अलग होती है। कुछ बच्चे इंट्रोवर्ट शांत स्वभाव के होते हैं जिन्हें लोगों के बीच रहने के बजाय अकेले में किताबें पढ़कर या म्यूजिक सुनकर अपनी एनर्जी रीचार्ज करना पसंद होता है।
क्या करें: अगर आपका बच्चा इंट्रोवर्ट है तो उसे जबरदस्ती हर सोशल गैदरिंग या रिश्तेदारों के बीच बैठने के लिए मजबूर न करें। उसे उसकी गति से दुनिया का सामना करने दें।
बिना दबाव के फैमिली टाइम तय करें
बच्चा भले ही दिन का ज्यादातर समय अपने कमरे में बिताए लेकिन उसे यह अहसास होना चाहिए कि कमरा खोलने के बाद एक सुरक्षित और खुशहाल परिवार उसका इंतजार कर रहा है।
क्या करें: दिन में कम से कम एक बार जैसे डिनर पर सब साथ बैठें। वीकेंड पर बिना किसी एजेंडे के साथ में कोई गेम खेलें या मूवी देखें। इससे बच्चे का भावनात्मक जुड़ाव बना रहता है।
रेड फ्लैग्स खतरे के संकेतों को पहचानें
अकेले रहने की इच्छा और डिप्रेशन में एक बारीक लाइन होती है जिसे पैरेंट्स को पहचानना जरूरी है।
कब सावधान हों: अगर बच्चा अचानक अपने बेस्ट फ्रेंड्स से भी दूरी बना ले। उसकी भूख और नींद का पैटर्न बदल जाए। पढ़ाई का ग्राफ तेजी से गिरे या वह चिड़चिड़ा और उदास रहने लगे।
समाधान: ऐसी स्थिति में बिना देर किए किसी प्रोफेशनल चाइल्ड काउंसलर या थेरेपिस्ट की मदद लें।
बच्चे का अकेले वक्त बिताना हमेशा किसी समस्या का संकेत नहीं होता कई बार यह उनके आत्मविश्वास और आत्म-विकास के लिए जरूरी होता है। पैरेंट्स का काम उनके और कमरे के दरवाजे के बीच दूरी बनाना नहीं बल्कि उनके दिल का दरवाजा हमेशा खुला रखना है।
हेमलता शर्मा जयपुर
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