Parenting: अति-सुरक्षा का पिंजरा प्यार की आड़ में बच्चों से छिन रहा आत्मनिर्भरता का अधिकार

Parenting: अति-सुरक्षा का पिंजरा प्यार की आड़ में बच्चों से छिन रहा आत्मनिर्भरता का अधिकार

​आज के दौर में बच्चों को माता-पिता से भरपूर लाड-प्यार और बेहतरीन सुविधाएं मिल रही हैं। लेकिन इस अत्यधिक स्नेह और ज़रूरत से ज़्यादा सुरक्षा के बीच एक बहुत बारीक लकीर है जिसे समझना ज़रूरी है। जब माता-पिता बच्चों की हर छोटी-बड़ी मुश्किल खुद हल करने लगते हैं तो वे अनजाने में बच्चों से उनके परिपक्व और स्वतंत्र बनने का अधिकार छीन लेते हैं।

​आधुनिक समय में माता-पिता अपने बच्चों को हर सुख-सुविधा देने के लिए तत्पर रहते हैं, जिसमें उनका स्कूल खान-पान और यहाँ तक कि उनकी दोस्ती भी शामिल है। अभिभावक बच्चों के स्कूल का बैग तैयार करने से लेकर उनके हर छोटे झगड़े में खुद कूद पड़ते हैं ताकि बच्चे को कोई तकलीफ न हो। इस ज़रूरत से ज़्यादा लाड-प्यार का नतीजा यह होता है कि बच्चे आराम की जिंदगी तो जी लेते हैं लेकिन उनमें वास्तविक दुनिया का सामना करने के लिए ज़रूरी जीवन कौशल और आत्मनिर्भरता विकसित नहीं हो पाती।

माता-पिता का यह व्यवहार पूरी तरह से प्रेम और फिक्र से पैदा होता है क्योंकि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे को रोते या असफल होते नहीं देखना चाहते। लेकिन बच्चों को हर विपरीत परिस्थिति से बचाकर रखने का एक नुकसान यह होता है कि वे भावनात्मक रूप से कमज़ोर होने लगते हैं। जो बच्चे घर के छोटे काम जैसे अपने कपड़े समेटना या अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेना नहीं सीखते वे आगे चलकर समाज में मिलने वाली एक छोटी सी आलोचना या असफलता से भी बुरी तरह टूट जाते हैं।

​इसके उलट जो बच्चे बहुत अधिक सुख-सुविधाओं में नहीं पलते वे जीवन की कड़वी सच्चाई और कड़ी मेहनत के महत्व को बहुत जल्दी समझ जाते हैं। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चों को मजबूत बनाने के लिए जानबूझकर दुखों में झोंक दिया जाए बल्कि उन्हें छोटी-मोटी जिम्मेदारियाँ उठाने की आज़ादी दी जानी चाहिए। जब बच्चों को सही मार्गदर्शन के साथ थोड़ा खुला माहौल मिलता है तो विपरीत परिस्थितियों में भी उनके भीतर एक अनोखा लचीलापन और खुद के फैसले लेने का आत्मविश्वास आ जाता है। ​

विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि परिवार का काम बच्चे को सिर्फ एक सुरक्षित घेरा देना नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व को मजबूत बनाना है। बच्चों में जिम्मेदारी सब्र और समझदारी जैसे गुण केवल उपदेश देने से नहीं आते बल्कि खुद गलतियाँ करने और उन्हें सुधारने से आते हैं। सच्चे प्यार का मतलब बच्चे के रास्ते से सारे कांटे हटाना नहीं है बल्कि उसे मजबूत जूता पहनाना है ताकि वह हर रास्ते पर चल सके। माता-पिता को बच्चों का सहारा बनना चाहिए न कि उनके हिस्से का काम करके उनके पैर बन जाना चाहिए। 

-हेमलता शर्मा, जयपुर

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