Parenting : डिजिटल युग में बच्चों को किताबों का दोस्त बनाने के प्रभावी तरीके

Parenting : डिजिटल युग में बच्चों को किताबों का दोस्त बनाने के प्रभावी तरीके

आज के दौर में जब हर तरफ स्क्रीन और सोशल मीडिया का शोर है बच्चों का ध्यान किताबों की ओर खींचना माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। मोबाइल और रील्स की दुनिया ने बच्चों की एकाग्रता को कम कर दिया है। ऐसे में उन्हें फिर से साहित्य की दुनिया से जोड़ना उनके मानसिक विकास के लिए बहुत जरूरी है। 

बच्चों में पढ़ने की रुचि जगाने के लिए आप निम्नलिखित बदलाव कर सकते हैं। घर के माहौल में बदलाव लाएंः कहा जाता है कि बच्चे वही करते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा मोबाइल छोड़कर किताब उठाए तो सबसे पहले आपको स्वयं उसके सामने किताबें पढ़नी होंगी। घर में एक छोटा सा बुक शेल्फ रखें जहाँ किताबें सिर्फ सजावट के लिए न हों बल्कि चर्चा का विषय भी बनें। जब माता-पिता पढ़ने को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाते हैं तो बच्चे भी इसे स्वाभाविक रूप से अपनाने लगते हैं। 

पढ़ने की प्रक्रिया को मनोरंजक बनाएंः 
किताबों को बोझ न बनने दें। छोटे बच्चों को कहानियाँ सुनाते समय अपनी आवाज़ और हाव-भाव में बदलाव लाएं ताकि उन्हें कहानी जीवंत लगे। प्रसिद्ध जानकारों का मानना है कि बच्चों को पढ़ने के लिए मजबूर करने के बजाय ऐसा वातावरण देना चाहिए जहाँ उनकी जिज्ञासा खुद बढ़े। उनसे कहानी के बीच-बीच में सरल सवाल पूछें ताकि उनकी कल्पनाशक्ति का विकास हो सके। 

सही साहित्य और चुनाव की आज़ादीः 

बच्चों पर अपनी पसंद की किताबें न थोपें। उन्हें खुद अपनी पसंद की किताबें चुनने का मौका दें। शुरुआत में महापुरुषों की जीवनियां प्रेरणादायक कहानियां या चित्र वाली पुस्तकें जैसे बाल रामायण या पंचतंत्र दी जा सकती हैं। ये पुस्तकें न केवल जानकारी देती हैं, बल्कि बच्चों के चरित्र निर्माण में भी मदद करती हैं। 

स्क्रीन और किताबों के बीच संतुलनः 
आज के समय में डिजिटल माध्यमों को पूरी तरह बंद करना संभव नहीं है लेकिन उनकी एक समय सीमा तय करना अनिवार्य है। बहुत अधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की याददाश्त और फोकस को नुकसान पहुँचाता है। नियम बनाएं कि दिन का एक निश्चित समय केवल पढ़ने के लिए होगा। धीरे-धीरे यह अभ्यास उनके संस्कार का हिस्सा बन जाएगा। 

धैर्य और निरंतरता रखेंः 
पढ़ने की आदत रातों-रात विकसित नहीं होती। यह एक लंबी प्रक्रिया है जिसके लिए निरंतरता और धैर्य की आवश्यकता होती है। जब बच्चा नियमित रूप से किताबों के संपर्क में रहता है तो उसमें गहराई से सोचने और सवाल पूछने की क्षमता विकसित होती है जो उसे जीवन की हर परीक्षा में सफल बनाती है। संक्षेप में कहें तो बचपन को किताबों से जोड़ना ही भविष्य के एक समझदार समाज की नींव रखना है। 

-हेमलता शर्मा, जयपुर

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