भगवान शिव के पिता 40 फीट की गहरी सुरंग में विराजमान हैं! साल में एक मिलता है दर्शन का अवसर

भगवान शिव के पिता 40 फीट की गहरी सुरंग में विराजमान हैं! साल में एक मिलता है दर्शन का अवसर

वाराणसी। धर्म, अध्यात्म, और भक्ति की भूमि काशी और भगवान शिव का नाता बहुत गहरा है। वैसे तो ब्रह्मांड के हर कण में भगवान शिव व्याप्त हैं, लेकिन काशी का अटूट जुड़ाव भगवान शिव से सदियों पुराना है और यही कारण है कि काशी का हर वासी खुद पर अभिमान करता है क्योंकि उनकी रक्षा स्वयं महादेव करते हैं। 

माना जाता है कि काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है और वही हर मुसीबत से काशी को बचाते हैं। काशी में भगवान शिव के असंख्य मंदिर हैं, जिनकी महिमा पुराणों में भी व्याप्त है, लेकिन आज हम आपको काशी के ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां छोटे से छेद से भक्त भगवान शिव के पिता स्वरूप शिवलिंग पिता महेश्वर के दर्शन करते हैं। 

काशी में धरती पर, तंग गलियों में शीतला गली में भगवान शिव 40 फीट की सुरंग के अंदर विराजमान हैं। पहली नजर में लगता है कि भगवान शिव पाताल लोक में हैं और भक्त 40 फीट गहरी सुरंग से उनके दर्शन कर रहे हैं। पूरे देश में भगवान शिव का ऐसा मंदिर नहीं है, जहां भक्तों को सामने से नहीं, बल्कि शिवलिंग के ऊपर बनी सुरंग से दर्शन करने का मौका मिलता है। 

खास बात ये भी है कि ये अनोखा मंदिर साल में एक दिन, सिर्फ शिवरात्रि के दिन खुलता है। मंदिर के अंदर जाने पर भी मनाही है। भक्त सिर्फ सुरंग के छिद्र से ही दर्शन कर सकते हैं। भक्त जल अभिषेक, बिल्व अर्चना और अन्य अर्पण श्रद्धालु इसी छिद्र से करते हैं। मंदिर के पुजारी का कहना है कि मंदिर की दीवारों पर बने निशान और छापें इसकी प्राचीनता का प्रमाण हैं। 

यह मंदिर जमीन से 40 फीट नीचे स्थित है, इसलिए गर्भगृह हमेशा ठंडा रहता है। मंदिर तक जाने वाला रास्ता खतरनाक है, इसलिए भक्तों को साल में केवल एक बार ही मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। पितृ पक्ष के दौरान मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ लगती है। माना जाता है कि पिता महेश्वर शिवलिंग से पितृ तर जाते हैं और पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है। 

खास बात ये है कि मंदिर में दो शिवलिंग हैं, जिनमें से एक शिवलिंग, पिता महेश्वर, को भगवान शिव के पिता और दूसरे शिवलिंग, यानी पर पिता महेश्वर, को उनके दादा के रूप में पूजा जाता है। पर पिता परमेश्वर गहराई में बना गुमनाम मंदिर है। यहां बहुत कम लोग ही पूजा करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि पर पिता परमेश्वर क्रोधित स्वभाव के हैं और उन्हें पसंद नहीं है कि रोजाना भक्त उनकी पूजा करें, इसलिए शिवलिंग की पूजा पुजारी द्वारा ही होती है। 


पौराणिक किंवदंती के अनुसार, जब भगवान काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, तब प्राचीन शहर बनारस और गंगा नदी अस्तित्व में नहीं आए थे। देवी-देवता बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए इस दिव्य स्थान पर अवतरित हुए, लेकिन अपने पिता को इस पवित्र स्थान पर विराजमान न पाकर निराश हुए। जिसके बाद भगवान शिव के आह्वान पर पिता महेश्वर प्रकट हुए थे। हालांकि किसी भी पुराण में भगवान शिव के परिवार का जिक्र नहीं है, क्योंकि उन्हें ही सृष्टि का पालनहार माना है। आज तक कोई भी भगवान शिव के आदि और अंत का पता नहीं लगा पाया है।

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